लंका पहुँचने के लिए राम और उनके दोस्तों को समुद्र पार करना था। वानरों और भालुओं ने पत्थरों पर राम का नाम लिखा और उन्हें पानी में डाल दिया। पत्थर तैरने लगे!
एक नन्ही-सी गिलहरी भी मदद करना चाहती थी। वह रेत में लोटती और पत्थरों के बीच रेत झाड़ देती। राम ने प्यार से गिलहरी को सहलाया और उसे धन्यवाद कहा।
सबने मिलकर एक लंबा पुल बनाया और उस पर चलकर लंका पहुँच गए।
राम ने रावण से कहा कि सीता को लौटा दो, पर रावण ने एक न सुनी। वह घमंडी था और माफ़ी नहीं माँगना चाहता था।
एक बड़ा युद्ध शुरू हुआ। लक्ष्मण, हनुमान और वानर सेना बहादुरी से लड़े। रावण के दस सिर थे और उसके पास बहुत ताक़त थी, पर वह अपनी ताक़त का बुरा इस्तेमाल करता था।
आख़िर में राम ने अपना धनुष उठाया और एक चमकता हुआ बाण चलाया। रावण गिर पड़ा, और युद्ध ख़त्म हो गया। सीता आज़ाद हो गईं, और सब खुशी से जय-जयकार करने लगे।
कहानी की शिक्षादया और हिम्मत की आख़िर में जीत होती है। घमंड इंसान को गिरा देता है।
आओ बात करें: रावण के दस सिर थे, पर वह किसी की बात नहीं सुनता था। दूसरों की बात सुनना क्यों ज़रूरी है?



