वन में राम, सीता और लक्ष्मण पत्तों से बनी एक छोटी-सी कुटिया में रहते थे। उन्हें पक्षी, पेड़ और फूल बहुत अच्छे लगते थे।
जटायु नाम का एक दयालु बूढ़ा पक्षी उनका दोस्त बन गया। वह ऊँचे पेड़ों से उनका ध्यान रखता था।
एक दिन सीता ने चाँदी जैसे धब्बों वाला एक सुंदर सोने का हिरण देखा। उन्होंने कहा, “राम, वह हिरण मेरे लिए पकड़ लाइए!”
लक्ष्मण बोले, “भैया, सावधान रहना। यह कोई चाल हो सकती है।” पर राम हिरण के पीछे चले गए, और लक्ष्मण सीता की रक्षा के लिए रुक गए।
दूर से एक आवाज़ आई, “लक्ष्मण! मेरी मदद करो!” आवाज़ राम जैसी लग रही थी। सीता डर गईं और उन्होंने लक्ष्मण से जाने को कहा। जाने से पहले लक्ष्मण ने कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींच दी। उन्होंने कहा, “भाभी, इस रेखा के बाहर पैर मत रखना।”
जब सीता इंतज़ार कर रही थीं, तब दुष्ट राजा रावण भेस बदलकर आया। जैसे ही सीता रेखा से बाहर निकलीं, वह उन्हें अपने उड़ने वाले रथ में बिठाकर ले गया। बहादुर जटायु ने उसे रोकने की कोशिश की, पर रावण बहुत ताक़तवर था।
कहानी की शिक्षाहर चीज़ वैसी नहीं होती जैसी दिखती है। किसी चमकीली चीज़ के पीछे जाने से पहले रुको और सोचो।
आओ बात करें: लक्ष्मण ने “सावधान रहना” क्यों कहा? तुम होते तो क्या करते?



